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भाषा

भाषा

हाथ, झंडी, बत्ती आदि से किए गए संकेतों, या सीटी के मध्यम से किए गए संकेतों से अलग, मानव मुख से निकले ध्वनि-संकेत (भावों या विचारों की) अभिव्यक्ति का मुख्य मध्यम हैं.

भाषा इन ध्वनि संकेतों की एक व्यवस्था है. यह व्यवस्था ध्वनियों के उच्चारण, शब्दों एवं पदों की रचना तथा वाक्यों की रचना में मिलती है. (उदाहरण - हिन्दी में ध्वनि विषयक व्यवस्था के अनुसार 'प्क', 'प्त' जैसे व्यंजन समूह से शब्द का आरम्भ नहीं होता है, जबकि 'प्य', 'प्र' ['प्यासा', 'प्रेम'] से हो सकता है.)

भाषा की अभिव्यक्ति के दो रूप हैं - मौखिक और लिखित. मौखिक रूप व्यक्ति के जीवन और समाज के विकास क्रम मैं पहले आता है और लिखित रूप बाद में आता है. मौखिक रूप हमें प्राकृतिक रूप से सहज ही प्राप्त हुआ लगता है, जबकि लिखित रूप को सीखने में विशेष प्रयत्न की आवश्यकता पड़ती है. लेखन क्रिया केवल एक युक्ति है, जिससे भाषा का उच्चरित रूप दृश्य संकेतों के प्रतीक-चिह्नों द्वारा अंकित किया जाता है.

ध्वनियों को अंकित करने के लिए निश्चित किए गए चिह्नों की व्यवस्था को लिपि कहते हैं. हिन्दी भाषा की चिह्न व्यवस्था को 'देवनागरी' लिपि कहते हैं. 'देवनागरी' लिपि-चिह्नों का ज्ञान ही हिन्दी का अक्षर-ज्ञान है.

भाषा के मौखिक और लिखित रूप की सुनिश्चित व्यवस्था इसके व्यवहार में नियमितता और मानकता लाती है. व्याकरण भाषा के नियमों का संकलन और विश्लेषण करता है. शैक्षिक व्याकरण इन नियमों को स्थिर करता है और भाषा को परिनिष्ठित बनाने में सहायक होता है. व्याकरण भाषा के नियम नहीं बनाता, बल्कि वह प्रचलित भाषा-प्रयोग को आधार मानकर उसका विश्लेषण करता है, समाज द्वारा सिद्ध प्रयोग का अनुसरण करता हुआ भाषा के स्वीकार्य एवं अस्वीकार्य रूपों में भेद करने में सहायता करता है.

व्याकरण में भाषा का विश्लेषण कई स्तरों पर किया जाता है -

  • ध्वनि तथा उच्चारण के स्तर पर,
  • लिपि तथा वर्तनी के स्तर पर,
  • शब्द के स्तर पर,
  • पद के स्तर पर,
  • वाक्य-रचना के स्तर पर,
  • अर्थ के स्तर पर.
Keywords: 
hindi, language, devnagari, script, grammar